रियासत की सियासत के लिए राजनीति की रपटीली राहों पर उतर चुकी हैं ये रानियां

राजघरानों की राजशाही 1971 में ही इंदिरा गांधी ने बंद कर दी थी लेकिन अब राजघरानों की रानियां और राजकुमारियां चुनावी मैदान में उतरकर अपनी सत्ता चला रही हैं.

1947 में आजादी के बाद राजपरिवारों के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया क्योंकि भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत शासन की राह चुनी थी. अब जनता को ही हर पांच साल में तय करना था कि देश में किसका शासन होगा. लेकिन ये रास्ता आसान नहीं था क्योंकि अंग्रेजों से तत्कालीन भारत सरकार को जो दस्तावेज सौंपे गए थे उनमें  500 से ज़्यादा रियासतें  थीं. जिनका शासन 48 प्रतिशत जमीन और 28 प्रतिशत जनता पर था. 

इनको मिलाकर एक झंडे के नीचे लाना किसी ‘अश्वमेध यज्ञ’ से कम नहीं था. सदियों से शाही ठाठ बाट और शानो-शौकत के आदी हो चुके इनमें से कई राजपरिवार बगावत को भी तैयार थे. इन सबको मिलाकर एक व्यवस्था के तहत लाने की जिम्मेदारी उस समय के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को दी गई थी.तय किया गया कि सभी राज परिवारों को उनकी हैसियत के हिसाब से एकमुश्त राशि पेंशन के तौर पर दी जाएगी. लेकिन इनमें से किसी को भी अपनी सेना या पुलिस रखने का अधिकार नहीं होगा. सभी को एक तयशुदा कानून के दायरे में लाया जाएगा. लेकिन कई राजपरिवारों ने इसका विद्रोह किया. हालांकि सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति के चलते सभी को मिलाकर एक संविधान के नीचे लाना संभव हो पाया.इंदिरा गांधी ने बंद कर दिया था राजा-रजवाड़ों को दिया जाने वाला प्रिवी पर्ससाल 1947 में देश को आजादी तो मिल गई थी लेकिन अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद 555 राजे रजवाड़ों को आर्थिक मदद मिलती रही. जिसे प्रिवी पर्स के नाम से जाना जाता था. इसके अलावा उनकी पहले की हैसियत को देखते हुए उन्हें दी जाने वाली तोपों की सलामी की व्यवस्था भी जारी थी. 1947 से पहले भोपाल, जोधपुर और त्रावणकोर रियासत ने भारत के साथ विलय के प्रस्ताव को मान लिया था लेकिन कई रियासतें भारत की आजादी के बाद देश में शामिल हुई थीं. हालांकि भारतीय संघ से मिलने के एवज में इन रजवाड़ों को अपनी रियासत के हिसाब से 5 हजार रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक मिलते थे.

हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा, जयपुर और पटियाला के पूर्व राजपरिवारों को सालाना 10 लाख रुपए भारत सरकार द्वारा दिए जाते थे. साफ है कि ये राशि 1947 के दौर में बहुत ज्यादा थी. ऐसे में सरकार पर काफी बोझ पड़ रहा था. जिसके बाद उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक बड़ा फैसला लिया और 1969 में संसद में राजाओं को दी जाने वाली इस सुविधा को खत्म करने के बाबत बिल पेश किया. हालांकि संसद में इसे एकमत से अस्वीकार कर दिया गया.फिर ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में राष्ट्रपति के आदेश को रद्द कर दिया. हालांकि जनता की भावना इस मामले में कांग्रेस के साथ थी. हवा वही थी जो इंदिरा चाहती थीं. उन्होंने सरकार भंग कर दोबारा चुनाव कराने की घोषणा कर दी. ये चुनाव भारी मतों से जीतकर इंदिरा फिर सत्ता में लौटीं और इस विधेयक को 1971 में दोबारा लेकर आईं. जिसके बाद संविधान में 26वां संशोधन करके ‘प्रिवी पर्स’ को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया. उन्होंने इस बिल को लाने के पीछे साभी नागरिकों के लिए एक समान अधिकार एवं सरकारी धन का व्यर्थ व्यय का हवाला दिया था.कई राजाओं ने इसका विरोध किया. प्रिवी पर्स को बंद किए जाने पर इसका मुखर रूप से विरोध करने वाले राजाओं में सबसे आगे मंसूर अली खान पटौदी का नाम था. उन्होंने इंदिरा गांधी के इस फैसले को 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की. वो गुड़गांव से विशाल हरियाणा पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़े. उन्होंने अपने प्रचार अभियान में इसका विरोध भी किया और इस फैसले के खिलाफ जनता को एकजुट करने की कोशिश की. उन्हें इस बात की पूरी उम्मीद थी कि उनकी प्रजा उनका साथ देगी. हालांकि उनके चुनाव हारने के साथ ही उनकी उम्मीद भी टूट गई. उन्हें महज पांच फीसदी वोट मिले थे.अब वर्तमान समय की बात करें तो देश की राजनीति में आधे से अधिक राजपरिवार जुड़े हुए हैं. जबकि पार्टियां समुदायों पर अपने प्रभाव के कारण मतदाताओं को प्रभावित कर रही हैं. लोग आज भी कई राजाओं को राजा साहब और रानी साहिबा के रूप में सम्मान देते हैं. राजाओं ने राजनीति का किया रुखराजमहलों से निकलकर राजाओं के राजनीति में आने का चलन 1951-52 में शुरू हुआ था. जब तत्कालीन राजा स्व हनवंत सिंह राठौड़ ने लोकसभा चुनाव लड़ा था. वो जोधपुर रियासत से आते थे. हालांकि पहली बार चुनाव लड़ने के बाद उसके परिणाम आने से पहले ही एक विमान हादसे में उनकी मौत हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे गज सिंह और बेटी राजकुमारी चंद्रेश कुमारी कटोच ने राजनीति में अपनी किस्मत आजमाई और दोनों की किस्मत चल पड़ी. इसके बाद 50 के दशक की शुरुआत में ही बीकानेर के राजा करणी सिंह ने भी चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उनके बाद उनकी पोती सिद्धि कुमारी ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया.वर्तमान में कहां-कहां रानी-राजकुमारी कर रहीं सियासत?विजयाराजे सिंधिया- देश के आजाद होने के बाद साल 1957 में महारानी राजमाता विजयराजे सिंधिया ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी. 1957 में विजयराजे सिंधिया गुना लोकसभा सीट से जीत हासिल कर पहली बार संसद में पहुंची थीं,  साल 1977 में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली. उन्होंने 2 बार कांग्रेस से, 4 बार भाजपा से, 1 बार जनसंघ और 1 बार निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी. हालांकि एक बार इंदिरा गांधी के सामने चुनाव लड़कर उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा था. इसके बाद उनके बेटे माधवराव सिंधिया ने 1971 से चुनाव लड़ा और 1999 तक 9 बार चुनाव जीते.जिसके बाद जय विलास पैलेस की राजनीति दो धड़ों में बंट गई. 25 जनवरी 2000 में विजयराजे सिंधिया की मौत के बाद उनकी बेटी यशोधरा राजे ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया था.वसुंधरा राजे- ग्वालियर राजघराने से संबंध रखने वालीं वसुंधरा राजे की शादी 17 नवंबर 1972 को धौलपुर के एक जाट राजघराने में हुई थी. राजे को 1984 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया. इसके बाद 1985-87 के बीच राजे भारतीय जनता युवा मोर्चा राजस्थान की उपाध्यक्ष रहीं. इसके बाद 1987 में वो राजस्थान प्रदेश भाजपा की उपाध्यक्ष बनीं. 1998-1999 में अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में वसुंधरा राजे को विदेश राज्यमंत्री बनाया गया. इसके बाद अक्टूबर 1999 में फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें राज्यमंत्री के तौर पर स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया. भैरोंसिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें राजस्थान में बीजेपी का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया. वसुंधरा राजे वही नेता हैं जब बीजेपी कहीं पर भी बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर पा रही थी तब उन्होंने 2003 में हुए चुनाव में बीजेपी को 120 सीटें दिलाई थीं. ये पहली बार था जब बीजेपी को किसी राज्य में बहुमत मिला था. इसके बाद वसुंधरा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वसुंधरा राजे 4 बार विधायक रह चुकी हैं और 5 बार लोकसभा सांसद रही हैं. अब राजस्थान में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे को उनकी सीट झालरापाटन से टिकट दिया गया है. दीया कुमारी- जयपुर की महारानी और कूचबिहार की राजकुमारी गायत्री देवी ने भी लोकसभा चुनाव में लड़ा और 1962 में स्वतंत्र पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लगातार तीन बार जीत हासिल की. अब राजसमंद से भाजपा सांसद दीया कुमारी जयपुर राजघराने की वर्तमान वंशज हैं. राजकुमारी दीया जयपुर के पूर्व महाराज सवाई भवानी सिंह और रानी पद्मिनी देवी की इकलौती संतान हैं. उनकी पढ़ाई नई दिल्‍ली के मॉडर्न स्कूल और जयपुर के महारानी गायत्री देवी गर्ल्स पब्लिक स्कूल से हुई थी. जिसके बाद उन्होंने लंदन में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की. इसके बाद जब वो राजमहल के अकाउंट का काम देख रही थीं, तभी उनकी मुलाकात नरेंद्र सिंह से हुई. उन्होंने अपने परिवार को बताए बिना 1994 में दिल्ली में नरेंद्र सिंह से गुपचुप तरीके से कोर्ट मैरिज कर ली थी. जिसके 2 साल बाद उन्होंने अपनी मां को इस राज के बारे में बताया था. बाद में शाही तरीके से उनकी शादी करवाई गई. हालांकि मनमुटाव के चलते 2019 में उन्होंने नरेंद्र सिंह से तलाक ले लिया और अब वो अपने परिवार की विरासत को संभाल रही हैं. 3 बच्चों की मां दीया कुमारी ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 2013 में की थी. पहली बार उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद 2019 में उन्हें बीजेपी ने लोकसभा टिकट दिया और जीतकर दिया संसद में जा पहुंची. वर्तमान में सांसद दीया कुमारी को राजघराने से संबंध रखने वाली और पूर्व मुख्यमंत्री वंसुधरा राजे के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में वो फिलहाल खासी चर्चाओं में हैं. यशोधरा राजे सिंधिया- लंदन में पैदा हुईं जिवाजीराव सिंधिया और स्वर्गीय राजमाता विजयाराजे सिंधिया की बेटी यशोधरा राजे सिंधिया ने 1998 में बीजेपी की सदस्यता ली थी. उन्होंने मुंबई के कैथेड्रल और जॉन कॉनन स्कूल, फिर प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट, कोडाईकनाल और सिंधिया कन्या विद्यालय ग्वालियर से अपनी पढ़ाई पूरी की थी. 1977 में वो कार्डियोलॉजिस्ट सिद्धार्थ भंसाली के साथ शादी करने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स चली गईं थी. यहां उनके तीन बच्चे हुए. 1994 में वह भारत लौट आईं और औपचारिक रूप से 1998 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सदस्य के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. 2005 से लेकर 2007 तक यशोधरा मध्य प्रदेश सरकार में पर्यटन, खेल और युवा कल्याण मंत्री रहीं. इसके बाद 2007 में हुए उपचुनाव में वो 14वीं लोकसभा के लिए चुनी गईं. 2009 में दूसरी बार यशोधरा ने फिर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद 2013 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा. यहां से जीत हासिल करने के बाद उन्होंने 19 दिसंबर 2013 को लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. 2018 में भी यशोधरा राजे सिंधिया ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी. हालांकि पिछले 2 सालों में अलग-अलग मंचों पर बीजेपी के खिलाफ उनकी नाराजगी साफ नजर आने लगी है. अब हाल ही में उन्होंने इस बार विधानसभा चुनाव न लड़ने और राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा करके सभी को हैरान कर दिया है.गायत्री राजे पंवार- मध्यप्रदेश के देवास राजघराने से संबंध रखने वालीं गायत्री राजे पंवार को भी देवास विधानसभा सीट से टिकट मिला है. गायत्री इसी सीट से वर्तमान में विधायक भी हैं. इस सीट से तुकोजी राव पवार लगातार छह बार यहां पर चुने गए और तुकोजी राव पवार का नाता शाही खानदान से रहा है. पहली बार वो 1990 में हुए चुनाव में जीते थे, उसके बाद उन्होंने लगातार इस सीट से जीत हासिल की थी. 2015 में तुकोजी राव का निधन हो गया, जिसके चलते उपचुनाव हुआ और उनकी पत्नी गायत्री राजे पवार को जीत मिली थी. इसके बाद 2018 के चुनाव में भी उन्हें जीत मिली थी. 2 बार विधायक रह चुकीं गायत्री राजे ने कांग्रेस के जयसिंह ठाकुर को हराया था. अब मध्यप्रदेश में नवंबर 2023 में होने वाले चुनाव में फिर इसी सीट से चुनाव लड़ने जा रही हैं.पक्षालिका सिंह- रानी पक्षालिका सिंह यूपी में बाह विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक हैं. पक्षलिका सपा सरकार में मंत्री रहे राजा अरिदमन सिंह की पत्नी हैं. पहले उनका परिवार मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ था. लेकिन 2017 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. रानी पक्षलिका सिंह यूपी की सबसे अमीर महिला विधायक हैं. 2017 में उन्होंने चुनाव आयोग को जो हलफनामा दिया था उसमें बताया था कि उनके पास लगभग 58 करोड़ रुपये की चल अचल संपत्ति है.रानी पक्षलिका सिंह भदावर रियासत से संबंध रखती हैं. ये इलाका चंबल के बीहड़ में पड़ता है इसलिए पक्षलिका सिंह को उनके क्षेत्र में लोग बीहड़ की रानी भी कहते हैं. पक्षलिका 2017 में पहली बार विधायक बनी थीं. इससे पहले वो 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ी थीं लेकिन जीत नहीं पाई थीं.रियासतों के माध्यम से पॉलिटिकल स्थिति मजबूत करते हैं राजघरानों के सदस्य!राजस्थान हो उत्तरप्रदेश या मध्यप्रदेश पूरे देश के विभिन्न राज्यों में रानियां और राजकुमारियां अब भी सत्ता में अपनी शाही अंदाज और विरासत को राजनीति में इस्तेमाल कर रही हैं. उनकी राजपरिवार की चमक भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. यही वजह है कि रानियां और महारानियों के लिए चुनावी मैदान में जीतना भी आसान हो जाता है.

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