भारत में कब तक खत्म होगा बाल विवाहः पिछले 5 साल के आंकड़े चौंकाने वाले

आज का भारत पहले की तुलना में बहुत आगे निकल चुका है, पढ़े लिखे लोगों की संख्या काफी बढ़ी है. इसके बावजूद देश बाल विवाह की परंपरा से मुक्त नहीं हो पाया है. आखिर क्या है कारण?

हमें आजाद हुए 75 साल से ज्यादा हो गए मगर आज भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अंत नहीं हो पाया है. बाल विवाह के खिलाफ सख्त कानून हैं फिर भी कुछ राज्यों में कम उम्र में बच्चों की शादी कर दी जा रही है. हालांकि, ऐसा नहीं है कि पहले से सुधार नहीं हुआ है. देशभर में पिछले दशकों में तुलना में आंकड़ा कम हुआ है मगर कुछ राज्यों में ग्राफ बढ़ा भी है.

लैंसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल की हालिया रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, 1993 से 2021 के बीच बचपन में लड़कियों की शादी की संख्या में 50 लाख की कमी आई है. मगर ये भी बताया गया है कि चार राज्य ऐसे हैं जिनका देश की कुल संख्या में 50 फीसदी हिस्सेदारी है.

2021 में लड़कियों के बाल विवाह में बिहार की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी 16.7 फीसदी थी. इसके बाद पश्चिम बंगाल की 15.2 फीसदी, उत्तर प्रदेश की 12.5 फीसदी और महाराष्ट्र की 8.2 फीसदी थी.

वहीं लड़कों के बाल विवाह की बात करें तो गुजरात का सबसे ज्यादा हिस्सा 29 फीसदी था. इसके बाद बिहार का 16.5 फीसदी, पश्चिम बंगाल का 12.9 फीसदी और उत्तर प्रदेश का 8.2 फीसदी हिस्सा था. यानी कि बचपन में शादी करने वाले लड़कों में इन्हीं 4 राज्यों का 60 फीसदी हिस्सा है.

बाल विवाह होता क्या है?

बाल विवाह एक सामाजिक समस्या है, एक कुप्रथा है. कानून के अनुसार, एक निश्चित उम्र से पहले यानी कि नाबालिग उम्र में किसी बच्चे को शादी के बंधन में बांध देना बाल विवाह कहलाता है. हर देश में बच्चे के बालिग होने की उम्र तय की गई है. भारत में लड़कियों की 18 साल की उम्र से पहले या लड़कों की 21 साल की उम्र से पहले शादी कर देना बाल विवाह माना जाता है. ऐसा करना कानूनी अपराध है.

आंकड़े बताते हैं सबसे ज्यादा बाल विवाह के मामले लड़कियों के साथ देखने को मिलते हैं. ज्यादातर लड़कियों की बालिग होने से पहले ही शादी कर दी जाती है. ऐसा करना अनैतिक, गैर-जिम्मेदार और नैतिकता के खिलाफ है. इससे बच्चों का बचपन तो छिनता ही है. लड़कियों को जिंदगीभर मानसिक और शारीरिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है. कम उम्र में मां बनना लड़कियों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है.

1993 से 2021 के बीच कितने बाल विवाह हुए

लैंसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल ने 1993 से 2021 तक 5 बार (1993, 1999, 2006, 2016, 2021) हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की है. रिसर्च में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और भारत सरकार से जुड़े लोग शामिल रहे हैं. इसमें पाया गया कि देश में हर 5 में से एक लड़की और 6 में एक लड़के का कानूनी तौर पर तय उम्र से पहले विवाह हुआ है. 

रिपोर्ट के अनुसार 1993 में 49.4 फीसदी लड़कियों का बाल विवाह हो रहा था, 2021 में यह आंकड़ा घटकर 22.3 प्रतिशत रह गया. वहीं लड़कों के बाल विवाह में भी कमी देखने को मिली. 2006 के 7.1 फीसदी से घटकर 2021 में 2.2 फीसदी हो गया. अनुमान है कि 2021 में लड़कियों के बाल विवाह की कुल संख्या 1 करोड़ 34 लाख 64 हजार 450 थी. वहीं लड़कों का आंकड़ा 14 लाख 54 हजार 894 रहा था.

संख्या के हिसाब से बंगाल में बढे सबसे ज्यादा केस 

1993 के मुकाबले 2021 में 50 लाख 19 हजार कम (27.2 फीसदी) लड़कियों के बाल विवाह हुए. लेकिन सात राज्य ऐसे भी हैं जहां पहले से संख्या बढ़ी है. ये राज्य हैं- झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, गोवा, असम, मणिपुर और बिहार. संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा (5 लाख) मामले पश्चिम बंगाल में बढ़े. यहां 1993 में 15.50 लाख लड़कियों के बाल विवाह करने का अनुमान है, वहीं 2021 में ये आंकड़ा बढ़कर 20.50 लाख पहुंच गया.

रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में 1993 में 3.52 लाख लड़कियों का बचपन में ही विवाह कर दिया गया था. 2021 में ये आंकड़ा बढ़कर 5.39 लाख हो गया. संख्या के हिसाब से 28 साल बाद सबसे ज्यादा गिरावट हिमाचल प्रदेश, केरल, नगालैंड, छत्तीसगढ, हरियाणा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में हुई.

गिरावट में यूपी का एक तिहाई योगदान होने के बावजूद….

उत्तर प्रदेश में लड़कियों के बाल विवाह में नाटकीय ढंग से बड़ी स्तर पर कमी आई है. 1993 में जहां 33 लाख 50 हजार 584 मामले देखे गए थे, 2021 में ये घटकर 16 लाख 80 हजार 312 रह गए. देश में कुल गिरावट का यूपी का एक तिहाई योगदान है. इसके बावजूद संख्या के हिसाब से कुल मामलों में यूपी का देश में तीसरा स्थान है. लड़कियों के कुल बाल विवाह में उत्तर प्रदेश की 12.5 फीसदी हिस्सेदारी है.

मणिपुर एकमात्र राज्य जहां 28 साल बाद बढ़े मामले

मणिपुर के अलावा सभी राज्यों में 1993 से 2021 के बीच लड़कियों के बाल विवाह में प्रतिशत के हिसाब से गिरावट देखी गई है. 1993 से 1999 के बीच 20 फीसदी (30 में से छह) राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बढ़ोतरी हुई. 1999 से 2006 के बीच 50 फीसदी (30 में से 15) राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मामले बढ़े. 2006 से 2016 के बीच लड़कियों में बाल विवाह में तेजी से गिरावट आई. 

मणिपुर एकमात्र राज्य था जहां 1993 के मुकाबले 2021 में लड़कियों के बाल विवाह का प्रतिशत बढ़ा, मगर 1999 से 2016 के बीच पहले यहां भी कमी देखने को मिली थी. 2016 से 2021 के बीच 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में से छह में लड़कियों के बाल विवाह के मामले बढ़े. ये राज्य हैं- मणिपुर, मेघालय, पंजाब, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, दादर एंड नागर.

क्या कहता है कानून

भारत में बाल विवाह रोकने के लिए आजादी के पहले से कानून बने हुए हैं. तमाम सरकारें समय-समय पर बाल विवाह रोकने के लिए अभियान चलाती रहीं हैं, योजनाएं भी लेकर आई हैं. मगर इन आंकड़ों को देखकर लगता है अभी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए लंबा समय लगेगा.  

सबसे पहले 1929 में बाल विवाह के खिलाफ कानून लाया गया था. तब लड़कों के लिए शादी की उम्र कम से कम 18 साल और लड़कियों की 14 साल थी. 1978 में संशोधन के बाद लड़कियों की 18 और लड़कों की उम्र 21 साल कर दी गई. 2006 में फिर संशोधन करके इसे गैर-जमानती अपराध करार दे दिया गया.

कितनी सजा का प्रावधान

बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के अनुसार, दोषी पाए जाने पर दो साल की जेल और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है. अगर लड़का बालिग होते हुए नाबालिग लड़की से शादी करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. यही नहीं, अगर बाल विवाह करवाने वाला कोई रिश्तेदार या मित्रगण भी दोषी पाया जाता है तो उसे भी दो साल जेल और 1 लाख का जुर्माना देना पड़ सकता है. 

इसके अलावा अदालत के पास ऐसी शादी को ‘शून्य’ घोषित करने का भी अधिकार होता है. लड़का या लड़की खुद भी कोर्ट जाकर ऐसी शादी को रद्द करने की अर्जी दे सकते हैं. वहीं अगर दोनों चाहें तो बालिग होने पर कोर्ट जाकर अपने बाल विवाह पर मान्यता प्राप्त कर सकते हैं.

अदालत की ओर शादी शून्य घोषित कर दिए जाने के बाद बालिग लड़के की जिम्मेदारी बनती है कि वो लड़की का भरण-पोषण करे. अगर लड़का नाबालिग है तो उसके माता पिता लड़की के गुजारे के लिए खर्चा देंगे.

क्या है बाल विवाह की वजह?

भारत में पढ़े लिखे लोगों की संख्या पहले काफी इजाफा हुआ है. 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में साक्षरता दर 74 फीसदी पर पहुंच गई है. इसके बावजूद बाल विवाह के मामले थमे नहीं है. बाल विवाह के कई कारण हो सकते हैं. जैसे- सोचने समझने की क्षमता में कमी, गरीबी, पुरानी परंपरा मानना आदि. पहले के समय में ज्यादातर लोग लड़कियों के जल्दी से जल्दी हाथ पीले कर देने पर विश्वास करते थे. आज भी कुछ लोग ये परंपरा मान रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी बाल विवाह का प्रचलन रहा है.

ग्रामीण इलाकों में कुछ परिवार ये डर भी रहता है कि कहीं उनकी लड़की बड़ी होकर किसी गलत रास्ते पर न चली जाए. इस डर का उन्हें एकमात्र उपाय जल्द से जल्द शादी कर देना ही दिखता है. कई बार बड़े-बुजुर्ग को ये कहते भी सुना जा सकता है कि वो जीते जी अपने घर के बच्चों की शादी देखना चाहते हैं. इसका प्रभाव ये होता है कि नाबालिग उम्र में ही बच्चों की शादी कर दी जाती है.

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