पिछले एक साल में कई बार अमेरिकी दौरा कर चुके हैं विदेश मंत्री एस जयशंकर, जानिए क्या है इसके पीछे का मकसद

अमेरिकी दौरे से वापस आए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दोनों देशों के रिश्ते पर कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते चंद्रयान की तरह चांद पर या उससे भी ऊपर पहुंचेंगे. 

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर 22 से 30 सितंबर तक अमेरिका दौरे पर थे. यहां वह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के वार्षिक सत्र में भाग लेने पहुंचे थे, कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उन्होंने शनिवार यानी 28 सितंबर को वाशिंगटन में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित ‘सेलिब्रेटिंग कलर्स ऑफ फ्रेंडशिप’ कार्यक्रम में भाग लिया. इस कार्यक्रम में उन्होंने अमेरिका के विभिन्न हिस्सों से इंडिया हाउस में एकत्र हुए सैकड़ों भारतीय-अमेरिकियों को संबोधित किया.

अपने इस दौरे के दौरान एस जयशंकर ने मोदी सरकार के केंद्र में रहते हुए दोनों देशों के गहराते रिश्ते (India-US Relationship) को एक अलग स्तर पर ले जाने की बात कही थी. विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते चंद्रयान की तरह चांद पर या उससे भी ऊपर पहुंचेंगे. 

विदेश मंत्री के इस दौरे से पहले जून में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी तीन दिनों के अमेरिकी दौरे पर गए थे. उस दौरान उन्होंने एक इंटरव्यू में भारत-अमेरिका रिश्तों को लेकर कहा था कि दोनों देशों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और गहरे हुए हैं, क्योंकि भारत भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में वैश्विक मंच पर अपनी सही जगह सुरक्षित करने के लिए आगे बढ़ रहा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के रिश्तें काफी गहरे हुए हैं…पिछले दो साल के बीच और पीएम और विदेश मंत्री कितनी बार अमेरिका जा चुके हैं और क्या भारत की अमेरिका से नजदीकी रूस से दूरी का कारण बन जाएगी.

पिछले डेढ़ सालों में 4 बार अमेरिकी यात्रा कर चुके हैं विदेश मंत्री और पीएम 

1. 22 से 30 सितंबर 2023: पिछले महीने ही 22 से 30 सितंबर तक विदेश मंत्री एस जयशंकर 9 दिवसीय यात्रा पर अमेरिका पहुंचे थे. इस दौरान उन्होंने वाशिंगटन में अपने समकक्ष अमेरिकी एंटनी ब्लिंकन, अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ सदस्यों, अमेरिकी व्यापारिक नेताओं और थिंक टैंक के साथ चर्चा की. यहां एस जयशंकर ने आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित चौथे विश्व संस्कृति महोत्सव को भी संबोधित किया.

2. 21 से 24 जून 2023: इससे पहले 21 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका दौरे पर गए थे. यहां वह 24 जून 2023 तक यूएस की राजकीय यात्रा पर थे. इस दौरान उन्होंने कम से कम एक दर्जन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका की पहली राजकीय यात्रा थी. 

3.18-28 सितंबर 2022: विदेश मंत्री एस जयशंकर 18 से 28 सितंबर 2022 तक 10 दिवसीय दौरे पर अमेरिका पहुंचे थे. इस दौरान उन्होंने  संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के 77 वें सत्र में उच्च स्तरीय सप्ताह के लिए एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया. 

4. 11-12 अप्रैल 2022: विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह साल 2022 में 11 और 12 अप्रैल को अमेरिका के दौरे पर थे.  इस दौरान रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री ने चौथे भारत-अमेरिका मंत्रिस्तरीय टू प्लस टू वार्ता में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. इसका आयोजन 11 अप्रैल को वाशिंगटन डीसी में किया गया था. 

पीएम मोदी के लिए स्टेट विजिट पर आमंत्रण काफी अहम 

20 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका अपने पहले स्टेट विजिट पर पहुंचे थे. इस विजिट पर उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आमंत्रित किया था और इसकी खास अहमियत होती है. इस विजिट के बीच भारत और अमेरिका के रिश्ते को लेकर तमाम विश्लेषकों के बीच बहस भी छिड़ गई है. कहा गया कि भारत और अमेरिका कभी इतने करीब नहीं थे. 

थिंक टैंक ‘द हेरिटेज फाउंडेशन’ में एशियन स्टडी सेंटर के डायरेक्टर जेफ एम स्मिथ ने अमेरिकी अखबार को दिए अपने एक बयान में दोनों देशों के रिश्तों पर बात करते हुए कहा, ”अमेरिका के अन्य रणनीतिक सहयोगियों की तुलना में भारत-अमेरिका के बीच मूल्यों का टकराव काफी कम है. भारत अमेरिका कई पारंपरिक साझेदारों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक और भू-राजनीतिक रूप से ज्यादा अहम है.’ 

वहीं इंडो पैसिफिक के एनालिस्ट डेरेक ग्रॉसमैन ने अंग्रेजी अखबार को दिए एक बयान में कहा, ”भारत और अमेरिका के रिश्ते कितने अच्छे हैं इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अमेरिका अपने हर सहयोगी देश को राजकीय डिनर और कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का मौका देता है. उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका अपने अन्य सहयोगियों की तुलना में भारत से ज्यादा उम्मीदें भी लगाए बैठा है.”

अमेरिका से बढ़ती नजदीकी के कारण 

पिछले डेढ़ साल में भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री कई बार अमेरिका का दौरा कर चुके है. इन दौरों को कई नजरिए से देखा जा रहा है. कुछ जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में भारत अमेरिका के करीब और रूस से दूर हो गया है. तो कुछ का कहना है कि अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. राजनीतिक जानकार का ये भी मानना है कि दोनों देशों की नजदीकी का एक कारण ये भी हो सकता है कि अमेरिका भारत को हथियार बेचना चाहता है और उसकी नजर भारत के विशाल बाजार पर है. इन तीनों बातों के पीछे ठोस तर्क दिए जा रहे हैं.

क्या भारत वाकई रूस से बनाना चाहता है दूरी 

जून महीने में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ‘द इकनॉमिस्ट’ को दिए इंटरव्यू में इस सवाल का जवाब दिया था. उन्होंने कहा था कि रूस के साथ भारत का रिश्ता 60 सालों के इतिहास का नतीजा है और ऐसा नहीं हो सकता है कि एक झटके में चीजें बदल जाएं. 

उन्होंने कहा कि रूस से उनके रिश्ते को अमेरिकी प्रशासन और नेतृत्व भी समझता है. उन्हें मालूम है कि अमेरिका ने साल 1965 के बाद भारत को हथियार नहीं बेचने का फैसला किया था, जिसके बाद हमें सोवियत संघ से हथियार लेना पड़ा. भारत के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था. 

जयशंकर ने कहा, ‘भारत चाहता है कि उसके पास तमाम विकल्प हों और वह अपने लिए सबसे बेहतर चुने.” ये कहना गलत नहीं है कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पश्चिम से ज्यादा एशिया के साथ व्यापार करने में दिलचस्पी ले रहा है. ऐसे में भारत और रूस के बीच सहयोग और बढ़ेगा ही. लेकिन इन सबके बीच भारत और अमेरिका की साझेदारी भी और मजबूत होगी. तो भारत किसी एक दिशा में नहीं चलेगा.

चीन की बढ़ती ताकत के कारण भारत अमेरिका की तरफ बढ़ रहा है

इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में भारतीय मूल के अमेरिकी पत्रकार फरीद जकारिया कहते हैं, ‘ पिछले कुछ सालों में चीन की जिस से तारत और सीमा पर आक्रामकता बढ़ी है उसे देखते हुए भारत का अमेरिका के करीब जाना कोई चौंकाने वाला कदम नहीं है. भले भारत और रूस के संबंध काफी पुराने और गहरे हैं लेकिन भारत चीन का सामना रूस के भरोसे नहीं कर सकता. ये भी भूलना नहीं चाहिए कि यूक्रेन में हो रही जंग के बाद मॉस्को बीजिंग का जूनियर पार्टनर बन गया है. अब चीन रूस को अपने हिसाब से मोड़ सकता है. 

चीन ने बना लिया है साउथ चाइना सी में अपना दबदबा

दरअसल चीन ने साउथ चाइना सी में अपना दबदबा बना लिया है और हिंद प्रशांत में भी चीन लगातार ताकतवर हो रहा है. ऐसे में चीन से निपटने के लिए भारत को कहीं न कहीं अमेरिका की जरूरत है. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका को एक ऐसे पार्टनर की तलाश है, जो न सिर्फ लोकतांत्रिक हो बल्कि ताकतवर भी हो. अमेरिका लगातार चीन के विकल्प की तलाश कर रहा है और भारत वहां बिल्कुल फिट बैठता है.

ऊपर से अमेरिका को ये चीज भी मालूम है कि भारत हथियारों का सबसे बड़ा मार्केट है. महंगे हथियारों को खऱीदने में भारत पीछे नहीं हटता है. अभी तक अमरेिका से ज्यादातर हथियार इसलिए नहीं खरीदे जाते थे, क्योंकि वह सिर्फ हथियार देता था, उनके साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसपऱ नहीं करता था. मगर हाल ही में कुछ हथियारों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया गया है.

भारत अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर 

इसके अलावा अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 191 अरब डॉलर का हो गया है. हालांकि भारत का चीन के साथ भी द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर को पार कर चुका है लेकिन भारत चीन में भयानक रूप से व्यापारिक घाटे का सामना कर रहा है. वहीं रूस की बात करें तो रूस यूक्रेन के बीच जंग के बाद भारत ने रूसे भले ही तेल खरीदा है, लेकिन फिर भी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 30 अरब डॉलर के पार ही जा पाया है. ऐसे में, भारत सिर्फ अपने अच्छे रिश्ते के दम पर भारत रूस से कई उपेक्षा नहीं कर सकता है.

भारत-कनाडा तनाव के बीच सुलह कराने में लगा अमेरिका 

भारत और अमेरिका के बीच गहराते रिश्ते का एक उदाहरण हाल के भारत-कनाडा तनाव के दौरान भी देखा गया. 18 सितंबर को कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारत का हाथ होने का आरोप लगाया था.

द इंडियन एक्सप्रेस अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार इस आरोप के लगभग पांच वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी और डिप्लोमैट्स ने बयान दिए हैं और इसमें कनाडा-भारत दोनों के लिए संदेश देने की कोशिश की गई. कनाडा और अमेरिका दोनों एक-दूसरे के सहयोगी देश हैं. फिर भी बयानों में जहां एक तरफ उन्होंने भारत को सहयोग करने के लिए कहा. तो वहीं दूसरी तरफ कनाडा से किसी भी नतीजे पर पहुंचने की जल्दी नहीं मचाने के लिए कहा गया. 

दोनों देशों में शुरू हुए विवाद पर अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन, स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन के नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल कॉर्डिनेटर जॉन किर्बी, भारत में अमेरिका के राजदूत एरिक गार्सेटी और कनाडा में अमेरिकी राजदूत डेविड कोहेन बयान दे चुके हैं.

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