दुनिया छोड़कर चले जाने के बाद मोदी के सामने 24 की चुनौती बना एक नेता, नाम है- कांशीराम

साल 1988 में इलाहाबाद में हुए लोकसभा उपचुनाव में कांशीराम भी मैदान में थे. उन्होंने वी.पी. सिंह और सुशील शास्त्री जैसे मजबूत उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी थी.

‘वोट से लेंगे पीएम/सीएम, आरक्षण से एसपी/डीएम’, ये बात 80 के दशक में कांशीराम ने कही थी. यह वह दौर था जब कांशीराम देश के दलितों, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों तक यह संदेश पहुचांने की कोशिश कर रहे थे कि देश की 85 प्रतिशत आबादी उनकी है, फिर भी सत्ता में स्वर्ण जातियां काबिज हैं. इन वर्गों को एकजुट होना चाहिए और सत्ता में ब्राह्मण और ठाकुरों का राज खत्म होना चाहिए. 2024 के चुनाव में कांशीराम की दलित पॉलिटिक्स बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बनती नजर आ रही है, कैसे? आइए जानते हैं.

देश में इस वक्त चुनावी माहौल है. विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव का महामुकाबला होगा. इस महामुकाबले के लिए सभी दलों ने सियासी बिसात बिछा दी है. सभी अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं. इस बीच जातिगत जनगणना के मुद्दे ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को धर्मसंकट में डाल दिया है. बिहार के कास्ट सर्वे के आंकड़े सामने आने के बाद सभी राज्यों में इसकी चर्चा तेज है. जहां विपक्ष इसके समर्थन में है तो वहीं बीजेपी जातिगत जनगणना के मुद्दे से दूरी बनाए हुए नजर आ रही है. ऐसा माना जा रहा है कि जातिगत आंकड़े जारी करके विपक्ष ने 2024 का एजेंडा सेट कर दिया है. खैर जातिगत जनगणना होगी या नहीं इस पर अभी कुछ भी साफ नहीं है, लेकिन कांग्रेस दलित वोटबैंक पर फिर से पकड़ बनाने के मकसद से ‘दलित गौरव संवाद’ कार्यक्रम शुरू करने जा रही है. 

09 अक्टूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर कार्यक्रम कर कांग्रेस उनकी दलित पॉलिटिक्स को हथियार बनाकर 2024 के लिए वोटबैंक बढ़ाने की कोशिश में है. इससे पहले राहुल गांधी को कांशीराम के नारे दोहराते हुए देखा गया है. 2 अक्टूबर को बिहार के कास्ट सर्वे के आंकड़े सामने आने के बाद राहुल गांधी ने X पर पोस्ट कर जातिगत आंकड़े जारी करने का समर्थन करते हुए कहा ‘जितनी आबादी, उतना हक’. उनके इस नारे पर बहुजन समाज पार्टी के नेता गिरिश चंद्र ने कांग्रेस पर कांशीराम को कॉपी करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’, कांशीराम के इस नारे को राहुल गांधी ने रीफ्रेज किया है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले के लिए 28 विपक्षी दलों ने मिलकर I.N.D.I.A. गठबंधन तैयार किया है, जिसमें कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी (BSP) शामिल नहीं है.

1984 में बनाई बीएसपी
14 अप्रैल, 1984 को कांशीराम ने दलितों, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों को साथ लाने के लिए बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी. इससे पहले वह ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटी एंप्लॉइज फेडरेशन (BAMCEF) और दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS4) जैसे दलों के तहत दलितों के हक के लिए आवाज उठाते रहे, लेकिन बसपा के जरिए उनके इस संघर्ष को पूरे देश में पहचान मिली. उनका जन्म पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था. बचपन में उन्होंने जो जाति आधारित भेदभाव देखा, उसने उन्हें निचली और पिछड़ी जातियों के लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया. 80 के दशक में उन्होंने दलितों के लिए उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में खूब रैलियां कीं. उनके इन प्रयासों ने बीएसपी के लिए दलित समुदाय खासतौर से यूपी में चुनावी आधार मजबूत किया, जिसने कांग्रेस को कमजोर कर दिया. दलितों के साथ पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग का वोटबैंक बीएसपी की ओर शिफ्ट हो गया और कांग्रेस का प्रभाव कम होने लगा. अब 2024 के चुनाव से पहले कांग्रेस उसको वापस पाने की कोशिश में है.

राजनीति में कांशीराम और बीएसपी का उदय
कांशीराम ने बीएसपी पार्टी बनाई और अब वह दलित पॉलिटिक्स और पार्टी को पूरे देश में पहचान दिलाने का मौका ढूंढ रहे थे, जो उन्हें तब मिला जब 1988 में उपचुनाव हुए. उस वक्त राजीव गांधी की सरकार थी और बोफोर्स स्कैंडल का मुद्दा चरम पर था. 1989 में लोकसभा चुनाव होने था, लेकिन बोफोर्स घोटाले में नाम आने से आहत होकर बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और राजनीति हमेशा के लिए छोड़ दी. इसी दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री वीपी सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी थी. इलाहाबाद में उपचुनाव की घोषणा हुई और तीन उम्मीदवार मैदान में थे. पहले निर्दलीय उम्मीदवार वीपी सिंह, जिनके सामने कांग्रेस ने लाल बहादु शास्त्री के बेटे सुशील शास्त्री को उतारा और तीसरे कैंडिडेट कांशीराम थे, जिनकी पार्टी उस वक्त राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रही थी. कांशीराम जानते थे कि वह ये चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन उनको ये भी पता था कि अपनी दलित राजनीति और बीएसपी को लॉन्च करने का इससे अच्छा मौका उनको नहीं मिल पाएगा.  

वीपी सिंह को दी थी कड़ी टक्कर
दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की 85 फीसदी आबादी देश में रहती है इसलिए कांशीराम का कहना था कि हमें ब्राह्मण और ठाकुर ही क्यों हुकूमत करेंगे. तब उनका ये नारा भी बहुत प्रसिद्ध हुआ था- वोट हमारा, राज तुम्हारा/ नहीं चलेगा, नहीं चलेगा. कांशीराम ने अपनी रैलियों में दलितो, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों से अपील की थी कि 40 सालों तक ऊंची जातियों ने तुम पर राज किया, अब एकजुट हो जाओ और ऊंची जातियों को उखाड़ फेंको. वह इस चुनाव में जीते तो नहीं लेकिन, उन्हें वीपी सिंह जैसे मजबूत प्रतिद्वंदी के खिलाफ 68,000 वोट मिले थे.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलितों का मिला साथ
इसके बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर यूपी में बीजेपी को चुनाव में हराया. अपनी इस उपलब्धि को उन्होंने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया और 2007 में मायावती पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आईं. अगर मायावती को दलितों के साथ पिछड़ा वर्ग और गरीब मुसलमानों के वोट नहीं मिलते तो उनकी जीत संभव नहीं थी. कांशीराम की जीवनी कांशीराम ‘द लीडर ऑफ दलित्स’ में ब्रदी नारायण बताते हैं कि किस तरह कांशीराम की बहुजन थीसिस ने मायावती को सत्ता में काबिज कराने में अहम भूमिका निभाई. अब जब बहुजन का इतना वोटबैंक बन चुका था तो ऊंची जातियों पर भी एक दवाब बन गया क्योंकि वो भी सत्ता में हिस्सेदारी चाहती थी और इससे यह बात सुनिश्चित हो गई कि बीएसपी दलित वोटबैंक में पकड़ बनाएं रखें और ऊंची जातियों का थोड़ा भी साथ मिल जाए तो वह सरकार बना सकती हैं.

2024 में कैसे बीजेपी के लिए चुनौती बनेगी दलित पॉलिटिक्स
जातिगत जनगणना के मुद्दे के बीच इस बात की भी चर्चा है कि बीजेपी का ओबीसी वोटबैंक बढ़ा है, जिसका फायदा उसको 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला. हालांकि, पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भले ही अपर कास्ट और ओबीसी का समर्थन बीजेपी को मिला, लेकिन दलितों का काफी वोट नहीं मिला. सीएसडीएस के मुताबिक, 2019 लोकसभा चुनाव में हिंदी भाषी 225 सीटों में से बीजेपी नीत एनडीए ने 203 सीटें जीतीं, जबकि 7 यूपीए और महगठंबधन ने 15 सीटें जीती थीं. ध्यान देने वाली बात ये है कि बीजेपी कांग्रेस से तीन हिंदी भाषी राज्यों में हार गई. ये आंकड़े इस ओर इशारा कर रहे हैं कि दलित समुदायों की पहली पसंद अब भी विपक्षी पार्टियां हैं.

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