जातीय सर्वे के बाद क्या आबादी के हिसाब से मुसलमानों को भी बिहार में हिस्सेदारी मिलेगी?

जातिगत सर्वे के मुताबिक बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ है, जिसमें 81.99 प्रतिशत हिंदू और 17.70 फीसदी मुसलमान हैं. भारत में मुसलमानों को सामान्य और पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है.

बिहार में जाति आधारित सर्वे के आंकड़ों ने मुसलमानों को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है. जातीय सर्वे के मुताबिक बिहार में करीब 17.70 यानी करीब 18 प्रतिशत मुसलमान हैं. यह हिंदुओं की सभी जातियों से अधिक है. हिंदुओं में यादवों की आबादी सबसे ज्यादा 14 प्रतिशत है.

सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही सवाल पूछा जा रहा है कि क्या आबादी के हिसाब से मुसलमानों को भी बिहार में हिस्सेदारी मिलेगी या यह हिस्सेदारी सिर्फ हिंदू के जातियों के लिए ही होगी? सोशल मीडिया पर मुस्लिम मुख्यमंत्री का हैशटेग तेजी से वायरल हो रहा है.

कांग्रेस नेता और प्रियंका गांधी के करीबी आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी मुस्लिम मुख्यमंत्री का जिक्र किया है. प्रमोद कृष्णम ने लिखा- बिहार में दलित और मुसलमानों की आबादी अधिक है. ऐसे में नीतीश कुमार को कुर्सी छोड़ देनी चाहिए. 18 प्रतिशत मुसलमान और 20 प्रतिशत दलित के रहते 3 प्रतिशत वाले कुर्मी कैसे मुख्यमंत्री रह सकता है?

प्रमोद कृष्णम ने आगे लिखा- नीतीश कुमार अगर जितनी जिसकी संख्या भारी- उतनी उसकी हिस्सेदारी के स्लोगन को सार्थक करना चाहते हैं, तो खुद के सीएम पद से इस्तीफा दे दें. हालांकि, इस तरह के बयान पर सरकार और उसके मंत्रियों की तरफ से कुछ भी नहीं कहा गया है.

बिहार में मुसलमानों की आबादी पर एक नजर 
जातिगत सर्वे के मुताबिक बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ है, जिसमें 81.99 प्रतिशत हिंदू और 17.70 फीसदी मुसलमान हैं. भारत में मुसलमानों को सामान्य और पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है. हालांकि, मुसलमानों का एक वर्ग लंबे वक्त से खुद को दलित कैटेगरी में भी शामिल करने की मांग करता आ रहा है.

हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में सवर्ण जाति के मुसलमानों को तीनों वर्गों- सैयद, शेख और पठान में बांटा गया है. अगड़ी जाति में सबसे बड़ी संख्या शेख मुसलमानों की है. इनकी तादाद 3.8217 प्रतिशत है. इसके बाद पठान 0.7548 फीसदी और फिर सैय्यद का नंबर आता है, जिनकी आबादी कुल 0.2279 प्रतिशत है.

पिछड़े जातियों में मदरिया, नालबंद, सुरजापुरी, अंसारी और मलिक मुस्लिम शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अधिक आबादी मोमिन अंसारी की है. वहीं दूसरी बड़ी आबादी सुरजापुरी मुस्लिम की है. पिछड़े मुसलमान में अंसारी, सुराजपुरी और धुनिया की आबादी 1 प्रतिशत से ज्यादा है.

रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में अंसारी मुसलमान  3.545 प्रतिशत, सुरजापुरी  1.87 प्रतिशत और धुनिया 1.42 प्रतिशत है. बाकी के 7 प्रतिशत में मुसलमानों की करीब 25 जातियां शामिल हैं.

बिहार के सत्ता में मुसलमान कहां?
243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में अभी 19 मुसलमान विधायक हैं. इनमें 12 राष्ट्रीय जनता दल से, 4 कांग्रेस से, 1-1 जनता दल यूनाइटेड, माले और एआईएमआईएम से है. विधानसभा में मुसलमानों से ज्यादा यादव (52 विधायक), राजपूत (28 विधायक) और भूमिहार (21) विधायक हैं.

यादव की आबादी 14 प्रतिशत,  राजपूत 3.4 प्रतिशत और भूमिहार 2.8 प्रतिशत हैं. बिहार में 7 मुस्लिम विधान पार्षद हैं, जिसमें जनता दल यूनाइटेड से 3, राष्ट्रीय जनता दल से 2, भारतीय जनता पार्टी से एक और एक निर्दलीय शामिल हैं. बिहार विधानपरिषद में कुल 75 सदस्य होते हैं.

मंत्रिमंडल की बात की जाए तो नीतीश सरकार में 5 मुस्लिम मंत्री और 8 यादव शामिल हैं. सरकार में राष्ट्रीय जनता दल से 3 और कांग्रेस-जनता दल यूनाइटेड के कोटे से एक-एक मुस्लिम मंत्री हैं. यादवों की बात की जाए तो जनता दल यूनाइटेड से 1 और राष्ट्रीय जनता दल से 7 यादव सरकार में मंत्री हैं.

राष्ट्रीय जनता दल को मिले 10 बड़े विभाग में एक भी विभाग मुस्लिम कोटे से मंत्री बने नेताओं के पास नहीं हैं. मुस्लिम कोटे से मंत्री इसरायल मंसूरी को आईटी, शमीम अहमद को विधि और शहनवाज को आपदा प्रबंधन जैसे कमतर विभाग दिए गए हैं. 

इसके उलट यादव कोटे से मंत्री बने नेताओं के पास बड़े विभाग हैं. लालू यादव के दोनों बेटे के पास स्वास्थ्य, नगर विकास, पथ निर्माण, ग्रामीण कार्य, वन एवं पर्यावरण जैसे अहम महकमा है. चंद्रशेखर यादव शिक्षा तो सुरेंद्र यादव के पास सहकारिता मंत्रालय का जिम्मा है.

जनता दल यूनाइटेड में यादव कोटे से मंत्री बने बिजेंद्र यादव के पास उर्जा और योजना जैसे महत्वपूर्ण विभाग है. वहीं संसदीय व्यवस्था की बात की जाए तो बिहार में एकमात्र मुस्लिम लोकसभा के सांसद हैं. किशनगंज सीट से मोहम्मद जावेद कांग्रेस के टिकट पर 2019 में चुनाव जीते थे. बिहार में लोकसभा की 40 सीटे हैं.

16 सीटों वाली राज्यसभा में जरूर 2 मुस्लिम सांसद हैं. राष्ट्रीय जनता दल ने फयाज अहमद और अहमद अशफाक करीम को अपने सिंबल से राज्यसभा भेजा है. बात डिसिजन मेकिंग की करें तो बिहार में मुसलमान काफी फिसड्डी हैं. मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, विधानसभा के स्पीकर, विधान परिषद के अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष जैसे पद पर मुसलमान नहीं हैं.

राजनीतिक दलों के संगठन में मुसलमान
बिहार विधानसभा में अभी 9 पार्टियों के विधायक हैं. इनमें कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और सीपीएम राष्ट्रीय पार्टी है. राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, हम और माले बिहार की राजनीति करती है, जबकि सीपीआई और एआईएमआईएम की पॉलिटिक्स कई राज्यों में है.

बिहार की सत्ता पर मुख्य रूप से राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और जनता दल यूनाइटेड काबिज है. विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी और जीतन राम मांझी की पार्टी हम है.

इन 5 दलों के संगठन की बात करे तो राष्ट्रीय जनता दल के टॉप बॉडी पार्लियामेंट्री बोर्ड में सिर्फ 1 मुसलमान हैं, जबकि 7 यादव को इसमें जगह मिली है. एक राजपूत जगदानंद सिंह भी राष्ट्रीय जनता दल के संसदीय बोर्ड में शामिल हैं. 

राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष भी राजपूत ही हैं. वहीं पार्टी संगठन में 11 राष्ट्रीय महासचिव हैं, जिसमें सिर्फ 2 मुसलमान हैं. 4 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष में एक भी मुस्लिम नहीं हैं. इसी तरह जनता दल यूनाइटेड के संगठन में भी मुसलमानों को ज्यादा तरजीह नहीं दी गई है.

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूमिहार बिरादरी से आने वाले ललन सिंह तो प्रदेश अध्यक्ष कुशवाहा बिरादरी से आने वाले उमेश कुशवाहा हैं. हालांकि, संगठन में मुसलमानों को जरूर समाहित किया गया है. जनता दल यूनाइटेड ने 5 मुस्लिम को संगठन में राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी है.

कांग्रेस में भी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भूमिहार के पास है. हालांकि, पार्टी ने तारिक अनवर को जरूर राष्ट्रीय टीम में जगह दी है. 

हिस्सेदारी की लड़ाई में कहां खड़ा है मुसलमान?
पूर्व विधानपार्षद प्रेम कुमार मणि कहते हैं- आजादी के बाद नीतीश कुमार ने पहली बार मुसलमानों के भीतर की जातियों को भी गिनने का काम किया है. यह एक क्रांतिकारी कदम है. मुसलमानों में भी आबादी से हिस्सेदारी की लड़ाई वर्षों पुरानी रही है.

2011 के जनगणना से पहले मुसलमानों में पिछड़े को आरक्षण देने की मांग उठी थी. 1998 से पसमांदा की लड़ाई लड़ने वाले पूर्व सांसद अली अनवर कहते हैं- डेटा आने के बाद लड़ाई मजबूत होगी. अभी तक सभी अनुमान लिखते थे, जिस पर विवाद भी रहता था. 

साल 1998 में पहली बार अली अनवर अंसारी ने पसमांदा मुस्लिम महाज का गठन किया था और मुसलमानों के नाम पर कुछ सवर्ण बिरादरी के लोगों को सांकेतिक भागीदारी देने को लेकर सवाल उठाया था.

अनवर के मुताबिक अब मुसलमानों की हिस्सेदारी की लड़ाई तेज होगी. वे कहते हैं- पहले मुसलमानों को साधने के लिए राजनीतिक पार्टियां 1-2 संपन्न मुसलमानों को पद दे देती थी, लेकिन अब यह करना मुश्किल होगा. राजनीतिक दलों को अब संख्या के हिसाब से संगठन और सरकार में तरजीह देनी पड़ेगी.

भारतीय जनता पार्टी के हार्ड हिंदुत्व राजनीति में क्या विपक्षी दल मुसलमानों को हिस्सेदारी देने की बात करेंगे? इस सवाल के जवाब में अली अनवर कहते हैं- अब यह लिखित है कि बिहार में पसमांदा मुसलमान करीब 10 प्रतिशत है. ऐसे में सभी दलों को इसकी हिस्सेदारी की बातें करनी पड़ेगी. जल्द ही हम भी आरक्षण का मुद्दा फिर से उठाएंगे.

अली अनवर आगे कहते हैं- जनगणना का डेटा आ गया है. आगे देखिएगा, आने वाले समय में राजनीतिक दलों के भीतर पसमांदा प्रकोष्ठ बनेगा. ठीक उसी तरह, जिस तरह राजनीतिक दलों के भीतर दलित और पिछड़ा प्रकोष्ठ है.

मुसलमानों को अलग से आरक्षण देने की लड़ाई तेज होगी?
इस सवाल पर पूर्व सांसद अली अनवर कहते हैं- मुसलमानों को खासकर पसमांदा मुसलमानों को अलग से आरक्षण देने की मांग नई नहीं है. अब चूंकि डेटा आ गया है तो यह मांग और मजबूत होगी. 

जामिया मिलिया इस्लामिया में कानून विभाग के प्रोफेसर असद मलिक कहते हैं- संविधान बनते वक्त भी मुसलमानों को रिजर्वेशन देने की बात उठी थी, लेकिन इसे टाल दिया गया था. 

2005 और 2008 में भी मुसलमानों की दुर्दशा सुधारने के लिए केंद्र ने पहल की थी. इसके लिए 2 कमेटियां बनाई गई थीं.

2005 में केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई जस्टिस राजेंद्र सच्चर कमेटी और बाद में रंगनाथ मिश्र कमेटी की रिपोर्ट में भी मुसलमानों के लिए सीट आरक्षित करने की सिफारिश की थी. इसमें कहा गया था कि दलित-आदिवासियों की तरह मुस्लिम बहुल सीटों को भी आरक्षित किया जाए, जिससे हिस्सेदारी तेजी से बढ़ सके. 

सच्चर कमेटी ने परिसीमन में मुस्लिम बहुल सीटों को एससी कैटेगरी में रिजर्व कर देने को लेकर भी हिदायत दी थी. हालांकि, सच्चर कमेटी रिपोर्ट के 18 साल बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. 

देश में करीब 6 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम आबादी अधिक है, लेकिन सीटें दलितों के लिए रिजर्व हैं. इनमें बुलंदशहर, नगीना, कच्छ और अहमदाबाद सीट शामिल हैं.

2008 में अमिताभ कुंडू के नेतृत्व वाली 4 सदस्यीय कमेटी ने अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी थी. इसे कुंडू कमेटी की रिपोर्ट से जाना जाता है. कमेटी ने देश में मुसलमानों के विकास के लिए डायवर्सिटी कमीशन पर जोर दिया था. 

कमेटी ने कहा था कि एजुकेशन से लेकर संसदीय हिस्सेदारी में मुसलमान पिछड़ा है, जिसे बदलने के लिए हर एक जगह पर अमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है. डिसीजन मेकिंग में मुसलमान जब आएंगे, तभी बड़े बदलाव संभव है. 

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