इजरायल: हर नागरिक के लिए जरूरी है ‘अग्निवीर’ वाली ट्रेनिंग, पूर्व प्रधानमंत्री ने भी बंदूक उठाकर संभाला मोर्चा 

इजरायल और हमास के बीच युद्ध को तीन दिन का वक्त हो चुका है. दोनों देशों के बीच जंग बढ़ती ही जा रही है. इस जंग में सेना का मोर्चा संभालने देश के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी सामने आ गए हैं.

इजरायल और हमास के बीच चल रही जंग का आज तीसरा दिन है. इस जंग में 970 से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं. साथ ही 2000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. जिसमें 600 से ज्यादा इजराइलियों ने अपनी जान गंवा दी है जबकि कई लोगों का अपहरण कर लिया गया है.

वहीं इजरायल द्वारा फिलिस्तीन पर किए गए हमले में 370 लोगों की मौत हुई है इसके अलावा 2200 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार हमास लड़ाकों ने कई इजराइली नागरिकों और सैनिकों को गाजा पट्टी और दक्षिणी इजरायल में बंधक बना लिया है, जिन्हें छुड़ाने की कार्रवाई जारी है.

इजरायल ने गाजा पट्टी में हमास के 17 ठिकानों और 4 हेडक्वाटर्स पर हमले किए हैं. इस बीच इजरायली सेना ने अपने रिजर्व सैनिकों को भी एक्टिव ड्यूटी पर बुला लिया है. जिसमें देश के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का भी नाम शामिल है. नफ्ताली ने अब फ्रंटलाइन पर इजरायली मोर्चा संभाल लिया है. उन्हें आईडीएफ कैंप में रिजर्व सैनिकों के बीच देखा गया. नफ्ताली बेनेट इजरायली सेना में कमांडर रह चुके हैं. ऐसे में उनके सेना में शामिल होने से इजरायल में एक सकारात्मक संदेश पहुंचा है. 

दरअसल इजरायल में सभी नागरिकों के लिए सेना में सेवा देना अनिवार्य है. इस कारण कई दूसरे राजनेताओं ने भी इजरायली सेना की अपनी-अपनी यूनिटों को ज्वाइन कर लिया है. दरअसल इजरायल में देश के हर नागरिक को मिलिट्री में ट्रेनिंग लेना जरूरी है.

कौन हैं नफ्ताली बेनेट?
यहूदी धर्म को मानने वाले नफ्ताली बेनेट सेल्फ मेड करोड़पति हैं. उन्होंने हाईटेक सेक्टर से करोड़ों रुपए कमाए हैं. नफ्ताली इजरायल की राजधानी तेल अवीव में रहते हैं. नफ्ताली बेनेट इजरायल के धुर विरोधी फिलिस्तीन की स्वतंत्रता का जमकर विरोध करते हैं. बेनेट ने पश्चिमी किनारे और पूर्वी यरुशलम में यहूदियों की बस्तियों को बसाने का काफी समर्थन किया है. 

फिलिस्तीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इजरायल की इस कोशिश को शांति की दिशा में सबसे बड़ी बाधा मानता है. बेनेट ने इस बस्तियों को बसाने की योजना में देरी के नेतन्याहू के फैसले की कड़ी निंदा की थी.

बता दें नफ्ताली बेनेट इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं. वो इजरायली डिफेंस फोर्सेज की एलीट कमांडो यूनिट सायरेत मटकल और मगलन के कमांडो रह चुके हैं. उन्होंने साल 2006 में बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में राजनीति में प्रवेश किया था. इसके बाद बेनेट नेतन्याहू के चीफ ऑफ स्टाफ बन गए. 

वहीं साल 2012 में नफ्ताली बेनेट द जुइश होम नाम की पार्टी से संसद के लिए चुने गए. इसके बाद वो न्यू राइट और यामिना पार्टी से भी नेसेट के सदस्य बने. साल 2012 से 2020 के बीच नेफ्ताली 5 बार इजरायली संसद के सदस्य बन चुके हैं. इसके अलावा 2019 से 2020 के बीच वो इजरायल के रक्षा मंत्री भी रहे हैं.

इजरायल में हर नागरिक की मिलिट्री ट्रेनिंग का क्या है नियम?
इजरायल में पुरुषों और महिलाओं के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा जरूरी होती है. इस देश में पुरुषों को ढाई साल सेना में रहना होता है तो वहीं महिलाओं को दो साल सेना में सेवा करना अनिवार्य होता है. कुछ विशेष परिस्थितियों में पुरुष सैनिकों को अतिरिक्त चार महीने की ट्रेनिंग देना जरूरी होता है तो वहीं महिलाओं को विशेष परिस्थितियों में 8 महीने अतिरिक्त सर्विस करनी होती है. 

नियम के तहत सेना में सर्विस देने वाला यहूदी, ड्रुज़ या सर्कसियन होना अनिवार्य है. वहीं अन्य इजरायली, धार्मिक महिलाओं, विवाहित व्यक्तियों और चिकित्सकीय या मानसिक रूप से अयोग्य समझे जाने वाले लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट दी गई है. हालांकि इस छूट के बाद भी कई इजरायली सेना में अपनी सेवा देते हैं.

कितने दुश्मन देशों से घिरा है इजरायल?
इजरायल के पांच दुश्मन देश मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन हैं. 1967 के जून में इजरायल और अरब देश के बीच की दुश्मनी उबाल मार रही थी. 5 जून आते-आते ये तनातनी इतनी बढ़ी कि युद्ध छिड़ गया.

एक तरफ मिस्र, सीरिया और जॉर्डन जैसे देशों के लड़ाके तो वहीं दूसरी ओर था अकेला इजरायल, सभी देशों को लग रहा था कि वो इजरायल को कुछ समय में ही खत्म कर देगें, लेकिन 6 दिनों तक चले इस युद्ध में इजरायल ने तीनों अरब देशों को पानी पिला दिया. 

इसका नतीजा ये हुआ कि इजराइल ने सिनाई प्रायद्वीप, गाज़ा, पूर्वी यरूशलम, पश्चिमी तट और गोलान पहाड़ी पर अपना कब्जा जमा लिया. बाद में संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से ये युद्ध रोका जा सका. जिसके बाद इजरायल ने दुनिया को ये बता दिया कि दुश्मनों से घिरा ये देश किसी से कम नहीं है.

कब बना इजरायल?
आज का इजराइल एक समय मे तुर्किए के ओटोमान साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब तुर्किए की हार हुई तो इस पूरे इलाके पर ब्रिटेन का कब्जा हो गया. 

हालांकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दुनिया दो शक्तियों में बंट गई, पहला अमेरिका और दूसरा रूस. ब्रिटेन इस युद्ध के बीच में फंस के रह गया था.  साथ ही इस युद्ध में ब्रिटेन को नुकसान भी खासा हुआ. जिसका असर ये हुआ कि 1945 में ब्रिटेन ने अपने अधिकार वाले इस हिस्से को यूनाइटेड नेशन को सौंप दिया. 

यूनाइटेड नेशन ने 1947 में इसे दो हिस्से में बांट दिया एक को अरब राज्य कहा गया और दूसरे को इजराइल. इजराइल वाले हिस्से में यहूदी भी थे. हालांकि, इसके अगले ही साल यानी 14 मई 1948 को इजराइल ने अपनी आज़ादी का ऐलान कर दिया.

क्या है हमास और कैसे बना ये चरमपंथी संगठन?
हमास की स्थापना 1980 के दशक में हुई थी. जो एक चरमपंथी संगठन होने के साथ ही एक राजनीतिक पार्टी भी है. 1987 में हमास ने अपनी ताकत का परिचय उस समय करवाया जब इसने इजरायल के खिलाफ फलस्तीनी लोगों की आवाज बुलंद करने के लिए पहले इंतिफादा की शुरुआत की.

अरबी में हमास का मतलब ‘इस्लामिक रेजिस्टेंस मूवमेंट’ होता है. जिसकी स्थापना शेख अहमद यासीन ने की थी.  शेख अहमद यासीन अपने पैरों पर चल नहीं पाते थे वह 12 साल की उम्र से ही व्हीलचेयर पर थे. शेख अहमद इस चरमपंथी संगठन ‘हमास’ के धार्मिक नेता थे. 2004 में हुए इजरायली हमले में उनकी मौत हो गई थी. 

हमास गाजा स्ट्रिप से ऑपरेट होता है. यहां पर ये संगठन सरकार चलाकर लोगों की मदद करता है. इसका एक मिलिट्री विंग है, जिसका नाम ‘इज्जेदीन अल-कासम ब्रिगेड’ है. ये ब्रिगेड ही इजराइल के ऊपर हमला करने का काम करती है.     

युद्ध के बीच आया एक और दुश्मन हिजबुल्ला क्या है?
हमास के बाद इजरायल पर हो रहे हमले में हिजबुल्ला का भी नाम सामने आया है. इजरायल पर हुए हमले की जिम्मेदारी हिजबुल्ला ने भी ली है. ऐसे में हिजबुल्लाह के बारे में जानना है तो लेबनान इतिहास पर एक नजर दौड़ानी होगी. 1943 में लेबनान में हुए एक समझौते में धार्मिक गुटों की राजनीतिक ताकतों को कुछ इस तरह बांटा गया- एक सुन्नी मुसलमान ही प्रधानमंत्री बन सकता था, दूसरा ईसाई राष्ट्रपति और संसद का स्पीकर शिया मुसलमान. हालांकि, यह धार्मिक संतुलन बहुत लंबे समय तक कायम नहीं रह पाया. फिलिस्तीनी लोगों के लेबनान में आकर बसने के बाद देश में सुन्नी मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा हो गई. 

वहीं दूसरी ओर ईसाई अल्पसंख्यक थे लेकिन सत्ता में भी थे. ऐसे में शिया मुसलमानों को हाशिये पर जाने का डर सताने लगा. इसी कारण 1975 में देश में गृह युद्ध छिड़ गया जो 15 साल तक चला. इस तनाव के बीच इजरायल ने 1978 में लेबनान के दक्षिणी हिस्से पर कब्जा कर लिया. फलीस्तीनी लड़ाके इस इलाके का इस्तेमाल इस्राएल के खिलाफ हमले के लिए कर रहे थे. इस बीच 1979 में ईरान में सरकार बदलने के बाद उसने इसे मध्य पूर्व में अपना दबदबा बढ़ाने के मौके के रूप में इस्तेमाल किया. 

ईरान ने लेबनान और इस्राएल के बीच तनाव का फायदा उठाना चाहा और शिया मुसलमानों पर प्रभाव डालना शुरू कर किया. इसके बाद 1982 में लेबनान में हिजबुल्लाह नाम का एक शिया संगठन बना जिसका मतलब था “अल्लाह की पार्टी”. ईरान ने इसे इस्राएल के खिलाफ आर्थिक मदद देना शुरू किया. जल्द ही हिजबुल्लाह दूसरे शिया संगठनों से भी टक्कर लेने लगा और तीन साल में इसने खुद को एक प्रतिरोधी संगठन के रूप में स्थापित कर लिया.

1985 में इसने अपना घोषणापत्र जारी किया जिसमें इसने लेबनान से सभी पश्चिमी ताकतों को निकालकर बाहर करने का ऐलान किया गया था. उस वक्त तक ये संगठन फ्रांस और अमेरिका के सैनिकों और दूतावास पर कई हमले भी कर चुका था. पत्र में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों को इस्लाम का दुश्मन घोषित किया गया था. साथ ही इस घोषणापत्र में इस्राएल की तबाही और ईरान के सर्वोच्च नेता की ओर वफादारी की बात भी कही गई. हिजबुल्लाह ने ईरान जैसी इस्लामी सरकार की पैरवी तो की लेकिन साथ ही यह भी कहा कि लेबनान के लोगों पर ईरान का शासन नहीं चलेगा.

इसके बाद धीरे-धीरे हिजबुल्लाह देश की राजनीति में भी सक्रिय होने लगा और 1992 के चुनावों में इसने संसद में आठ सीटें जीत लीं. इसके बाद भी हिजबुल्लाह के हमले जारी रहे. 90 के दशक के आखिरी तक ये अलग-अलग हमलों में कई लोगों की जान ले चुका था. जिसके बाद 1997 में अमेरिका ने इसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया.

साल 2000 में इस्राइली सैनिक आधिकारिक रूप से लेबनान से बाहर आ गए लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव खत्म नहीं हुआ. इसके बाद 2011 में जब सीरिया में गृह युद्ध छिड़ा तब हिजबुल्लाह ने बशर अल असद के समर्थन में अपने हजारों लड़ाके वहां भेजे थे. ऐसे में राजनीतिक रूप से हिजबुल्लाह लेबनान में और मजबूत होता गया. आज ये संगठन देश की एक अहम राजनीतिक पार्टी है, लेकिन दुनिया के कई देश इसे आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं. 2016 में सऊदी अरब भी इस सूची में शामिल हो गया. वहीं यूरोपीय संघ ने लंबी चर्चा के बाद 2013 में इसके सैन्य अंग को आतंकी घोषित किया था. अब जर्मनी के पूर्ण प्रतिबंध के बाद माना जा रहा है कि ईयू पर भी ऐसा करने का दबाव बढ़ेगा.

फिलिस्तीन से क्या है इजराइल का विवाद?
पहले विश्व युद्ध के बाद मध्य पूर्व में ऑटोमन साम्राज्य के खत्म होने के बाद इस इलाके पर ब्रितानियों ने कब्जा कर लिया था. जहां ज्यादातर यहूदी और अरब समुदाय के लोग निवास करते थे. दोनों में तनाव बढ़ने लगा. जिसके बाद ब्रितानी शासकों ने इस जगह यहूदियों के लिए फलस्तीन में ‘अलग जमीन’ बनाने की बात की.

1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का फैसला लिया. जिसमें एक हिस्सा यहूदियों के लिए और दूसरा हिस्सा अरब समुदायों के लिए रखने पर विचार किया गया. ऐसे में अरब के विरोध के बीच 14 मई 1948 को यहूदी नेताओं ने इजरायल राष्ट्र के गठन का ऐलान कर दिया और ब्रितानी यहां से चले गए.

इसके तुरंत बाद पहला इजरायल और अरब युद्ध छिड़ा. जिस कारण यहां लगभग साढ़े सात लाख फिलिस्तीनी बेघर हो गए. इस युद्ध के बाद ये पूरा क्षेत्र तीन हिस्सों में बंट गया. पहला हिस्सा इजराइल, दूसरा वेस्ट बैंक (जॉर्डन नदी का पश्चिमी किनारा)  और तीसरा गाजा पट्टी.

फलस्तीनी लोग गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में रहते हैं. लगभग 25 मील लंबी और 6 मील चौड़ी गाजा पट्टी 22 लाख लोगों की रिहाइश की जगह है. वहीं आबादी के हिसाब से देखें तो ये दुनिया का सबसे ज्यादा घनत्व वाला क्षेत्र है.

अल अक्सा मस्जिद विवाद क्या है?
अल अक्सा मस्जिद को लेकर मुस्लिम देशों से इजरायल की लड़ाई 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है. इसी को लेकर 7 अक्टूबर को फिर इजरायल और हमास के बीच जंग छिड़ गई. हमास ने इजरायल के शहरों में लगभग 5 हजार रॉकेट छोड़े. इस दौरान हमास ने ये भी दावा किया कि ये हमला यरूशलम में अल-अक्सा मस्जिद को इजरायल की तरफ से अपवित्र करने का बदला है. 

अल अक्सा मस्जिद के इतिहास को देखें तो यरुशलम दुनिया की एकमात्र ऐसी जगह है जहां दुनिया के तीन बड़े धर्म इस्लाम, ईसाई और यहूदी अपना पवित्र स्थल होने का दावा करते हैं. इन तीनों ही धर्मों को इब्राहमिक धर्म के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इन तीनों ही धर्मों के अनुसार ‘इब्राहिम’ ईश्वर के पैगंबर हैं. इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि यदि हम अपने आसपास नजर डालें तो इब्राहिम नाम के लोग इस्लाम, ईसाई और यहूदी तीनों ही धर्मों में देखने को मिल जाते हैं. ये तीनों सिर्फ एक ईश्वर को मानते हैं यहीं वजह है कि इन्हें एकेश्वरवादी धर्म के नाम से भी जाना जाता है.

यरुशलम में अल अक्सा मस्जिद को इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल बताया गया है. इसके अलावा बाइबल के मुताबिक यहूदियों के लिए इसी जगह पर करीब 1000 ईसा पूर्व में सोलोमन राजा ने दो मंदिरों की स्थापना करवाई थी. इस मंदिर को ‘टेंपल माउंट’ नाम से भी जाना जाता है, लेकिन अब सिर्फ इसकी एक दीवार बची है जिसे ‘वेस्ट वॉल’ कहा जाता है और ये यहूदियों के लिए सबसे पवित्र जगह है. इन मंदिरों को बेबीलोन से लेकर रोमन एंपायर ने इतिहास में कई बार ध्वस्त किया जा चुका है.

इसके इतर ईसाई धर्मग्रंथ न्यू टेस्टामेंट के अनुसार इसी शहर में ईसा मसीह ने अपना उपदेश दिया था. इसके अलावा इसी जगह उन्हें सूली पर चढ़ाया गया था. साथ ही यही वो जगह है जहां वो अवतरित हुए थे. यरूशलम शहर के बीच में प्राचीन शहर है जिसे ‘ओल्ड सिटी’ के नाम से जाना जाता है. यहीं पर अल अक्सा मस्जिद परिसर के अलावा ईसाइयों के इलाके में ‘द चर्च ऑफ द होली सेपल्कर’ है. ऐसे में, ये तीनों ही धर्म यरूशलम पर अपना-अपना दावा करते हैं.

वहीं यहूदियों के लिए सबसे पवित्र मानी जाने वाली जगह ‘टेंपल माउंट’, मुसलमानों का ‘अल अक्सा मस्जिद’ और डोम के लिए ‘डोम ऑफ टाउन’ एक ही परिसर में स्थित है. हालांकि टेंपल माउंट के अवशेष के रूप में वहां सिर्फ एक दीवार ही बची है. जिसे ‘वेस्ट वॉल’ के नाम से जाना जाता है. ऐसे में इस जगह को लेकर अक्सर यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच विवाद होता रहा है.

1967 में इजरायल जंग के बाद ये विवाद और गहरा गया. इसकी वजह ये है कि इस जंग में गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक पर इजरायल ने कब्जा कर लिया. इससे पहले ये इलाका जॉर्डन के कब्जे में था. हालांकि बाद में जॉर्डन और इजराइल के बीच एक समझौता हुआ. जिसमें ये तय किया गया कि अल-अक्सा मस्जिद के अंदर के मामलों को जॉर्डन का इस्लामिक ट्रस्ट वक्फ नियंत्रित करेगा. वहीं इसकी बाहरी सुरक्षा इजरायल संभालेगा. ऐसे में कई बार सुरक्षा की दृष्टि से इजरायली पुलिस मस्जिद के अंदर चली जाती है. इसे लेकर भी अक्सर दोनों देशों में जंग के हालात हो जाते हैं. 

जॉर्डन और इजराइल के बीच समझौते में इस बात पर भी सहमति बनी थी कि गैर-मुस्लिमों को मस्जिद के अंदर आने की इजाजत दी जाएगी हालांकि मस्जिद में उन्हें प्रार्थना करने की परमिशन नहीं दी गई. इसके बावजूद यहूदी बीच-बीच में वहां प्रार्थना करने की कोशिश करते हैं इसे लेकर भी वहां तनाव की स्थिति देखने को मिलती है.   

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